माँ घर आ रही …
माँ घर आ रही ।
अपने आँचल की कोर में बाँधे हुए रूढ़ प्रथाओं को,
अपने हृदय में समेटे हुए मेरी बचपन की यादों को।
माँ घर आ रही…
उसे पता है कि वह सिर्फ़ माँ है, न कि समाज का दिया दर्जा,
जहाँ से उसे इजाज़त लेनी पड़े बेटी के ससुराल जाने की,
जहाँ उसे बतानी पड़े वजह ब्याही बेटी के घर निहारने की।
माँ घर आ रही…..
मैंने पूछा था कभी उससे—
आओगी मेरे पास, जब भी मैं बुलाऊँगी?
या फिर तुम भी औरों की तरह ब्याह के बाद मुझे भूल जाओगी?
जहाँ जन्म लिया मैंने, क्या वह घर पराया होगा?
क्या तुमसे मिलना और तुम्हारे संग रहना सिर्फ़ मेरा सपना होगा?
क्या तुम भी कहोगी कि तेरे घर का पानी भी न छुऊँगी?
क्या पापा और तुम—तुम्हें उपहार दूँ, इसका भी हक मुझसे छीनोगी?
माँ मुस्कुरा रही थी।
किसने कहा ब्याह से बेटियाँ पराई होती हैं?
अरे, वह तो माँ की परछाई होती हैं।
भूल कोई कैसे सकता है स्वर्ग में बने इस रिश्ते को?
ये रस्म-क़सम कुछ भी नहीं, जो तोड़े बेटी की खुशियों को।
तुम्हें पढ़ाया, तुम्हें लिखाया, तुम्हें मैंने बेटों सा आगे बढ़ाया,
जब तुममें तेरे भाई में नहीं किया कभी कोई फ़र्क़, तो
क्यों मानूँ मैं तुम्हें ब्याह के बाद पराया और क्यों छीनूँ मैं तुम्हारा हक़?”
जब भी दिल करे माँ से मिलने को,तुम देना संदेश
या आ जाना घर अपने,माँ के लिए लाना भी संदेश।
मैं मुस्करा रही थी।
माँ मेरे घर आ रही ……✍️चंदा
