हॉस्पिटल का वह एक दिन
“मैं बहुत डर-सी गई थी। डॉक्टर ने प्रिस्क्रिप्शन में एमआरआई लिख दिया था। वैसे तो चालीस पार जा चुकी हूँ, पर कभी इस टेस्ट की नौबत नहीं आई। गुस्सा आ रहा था मुझे अपने पति पर — बस एक राग अलापते रहते हैं, फुल बॉडी चेकअप कराओ। उनकी ज़िद के आगे यह टेस्ट करवाना पड़ा और रिपोर्ट देखकर डॉक्टर ने यूटरस के फाइब्रॉइड के लिए सजेस्टिव एमआरआई लिख दी। डॉक्टर आश्वस्त होना चाहते थे कि सिस्ट कहीं कैंसरस तो नहीं?
डॉक्टर के संदेह ने मेरी रातों की नींद छीन ली थी। ऑफिस में दिल नहीं लगा, न ही घर में। बस दिमाग में कैंसर का डर हावी होता जा रहा था। अगर एमआरआई में कुछ पॉजिटिव आए तो क्या करूँगी? मुझे तो हॉस्पिटल जाने से डर लगता है। वहाँ की अनसुनी क्रंदन और अनसुनी चीखें मुझे सोचकर ही विचलित कर रही थीं। अभी तो बेटी भी बस बारह साल की है, वह कैसे जिएगी मेरे बिना? या अगर मैं बच भी जाऊँ, तो कैंसर के ट्रीटमेंट के साथ कैसे जी पाऊँगी? यह हॉस्पिटल रोज़ आना-जाना, यह कीमो — और… मैं किसी का ध्यान नहीं रख पाऊँगी, बस सब पर बोझ बनकर रह जाऊँगी।
खैर, डॉक्टर की बात तो माननी थी। हसबैंड ने अर्ली मॉर्निंग का अपॉइंटमेंट लिया और मुझे लेकर पास वाले हॉस्पिटल निकल पड़े। हमारी शादी के चौदह साल हो चुके थे, इसलिए उन्हें पता था कि मुझे बीमार होने से ज़्यादा डर हॉस्पिटल जाने से होता है, वह भी खुद के ट्रीटमेंट के लिए। साथ ही एमआरआई मशीन के अंदर एक क्लॉस्ट्रˈफ़ोबिक् का जाना भी उन्हें परेशान कर रहा था, इसलिए वह मुझे एमआरआई के लिए मानसिक रूप से तैयार कर रहे थे।
“कुछ नहीं है ये एमआरआई ! डॉक्टर ने सजेस्टिव लिखा है, मतलब वह सिर्फ़ कन्फर्म होना चाह रहे हैं कि यह कैंसरस नहीं है। और तुम्हें डर भी नहीं लगेगा, बस पंद्रह मिनट का ही है। इसे एब्रिविएटेड एमआरआई बोलते हैं। घबराओ मत, मैं भी तो बाहर बैठा रहूँगा।”
हसबैंड की बात सुनकर कुछ अच्छा लगा, पर मुझे आज भगवान पर भी गुस्सा आ रहा था। इतना पूजा-पाठ, इतनी सच्चाई के रास्ते पर चलने वाली मैं — कभी किसी का बुरा भी नहीं सोचती — मुझे ही क्यों यह सब?
मन के उथल-पुथल के बीच हॉस्पिटल पहुँची। कुछ पेपर लेने-देने के बाद नर्स मुझे अंदर लेकर आई और हसबैंड को बाहर छोड़ दिया गया।
वेटिंग एरिया में पहले से ही कुल चार पेशेंट बैठे थे, पर कोई भी परेशान-सा नहीं दिख रहा था। उनके चेहरे के एक्सप्रेशन से मुझे यह महसूस हो रहा था कि वे पहले भी इस प्रोसेस से गुजर चुके हैं। एक विदेशी महिला, जिसे जुकाम था, वह मेरे पास वाली कुर्सी पर बैठी थी। भेष-भूषा से काफ़ी अमीर दिख रही थी। एक बुजुर्ग महिला, एक अधेड़ उम्र का पुरुष और एक बीस-बाईस साल की लड़की, जिसके साथ उसकी एक छोटी बहन भी खड़ी थी।
मुझे ताज्जुब हुआ कि इस एरिया में अटेंडेंट को परमिट क्यों किया गया है, लेकिन मेरा संशय तब समाप्त हुआ जब वह लड़की सिर्फ़ कैनुला लगाने में काँपने लगी। उसकी बहन बार-बार उसके सिर पर हाथ रखकर उसे नॉर्मल करने की कोशिश कर रही थी।
पहले से ही डरी हुई मैं खुद को उनसे बात करने से रोक नहीं पाई।
“एमआरआई ब्रेन है इनका। सिर में ट्यूमर है, ऑपरेट होने की बात चल रही है। यह इन सब प्रोसेस से इतना डर गई है कि मेरी बहन डिप्रेशन में जा रही है। डॉक्टर ने इसकी घबराहट को देखते हुए मुझे पूरे प्रोसेस में इसके साथ रहने को कहा है, क्योंकि एमआरआई में कम से कम तीन घंटे लगेंगे।” उस छोटी लड़की की बहन से कहा ।
इतनी कम उम्र और यह सब! हे भगवान। मैं उस लड़की की तरफ़ देख रही थी कि उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और बिना किसी सवाल के मेरी तरफ़ देखती रही, जैसे वह मुझे नहीं, शून्य को निहार रही हो — जैसे कहीं भी किसी ओर से कुछ भी सही नहीं होगा।
बुजुर्ग महिला और पुरुष जैसे इस प्रक्रिया से पूरी तरह वाकिफ़ थे। वे अपने फोन में व्यस्त थे। उन्हें देखकर लग रहा था कि जो हो गया, वह ठीक है; जो हो रहा है, वह भी ठीक है — जैसे उन्होंने अपनी भावनाओं के आगे हथियार डाल दिए हों।
तभी मेरी नज़र नर्स पर पड़ी, जो विदेशी महिला से सवाल कर रही थी — “कोई प्रॉब्लम तो नहीं हुई न पिछली बार कीमो में?” और उस महिला ने ‘ना’ में सिर हिलाया। मैं चौंक-सी गई। मैं इतनी देर से उसके पास बैठी थी, लेकिन उसने मुझसे कोई सवाल नहीं पूछा था — बस मेरे सवालों का जवाब देती रही। और मैं भी कैसी इंसान हूँ कि हॉस्पिटल में आई इस महिला से उसकी बीमारी के बारे में न पूछकर, वह कहाँ से आई है, यहाँ कैसे रह रही है, हमारा देश उसे कैसा लग रहा है — जैसे अनर्गल सवाल पूछती रही! कम से कम उस महिला के मुंडे हुए सिर को भी तो मुझे देखना था, और उसका जुकाम — जो कीमो देने से इम्यूनिटी कम होने पर उसे हो गया था — उसे तो मुझे समझना था। मुझे लगा जैसे मुझसे कोई अपराध हो गया हो।
मैं महिला की तरफ़ देख ही रही थी कि तभी नर्स मेरे पास आई और कैनुला लगाने लगी।
“अरे, मुझे यह क्यों? मेरा तो एमआरआई है, वह भी एब्रिविएटेड!” मैं चीख पड़ी।
मेरे चिल्लाने को नर्स के कान में कोई जगह न मिली और वह मुस्कुराते हुए मुझसे कई सवाल पूछती रही और एक पेपर पर साइन लेकर मुझे एमआरआई रूम में लेकर चली गई।
पहली बार एमआरआई रूम में आकर मुझे झुरझुरी होने लगी। दिल किया भाग जाऊँ, फिर कभी आकर करा लूँगी। लेकिन मुझे सोचने का मौका न देते हुए स्ट्रेचर पर लिटाकर तुरंत ही कई वायर से जोड़ दिया गया।
“क्या मुझे इस डिब्बे में जाना होगा? मुझे बहुत डर लग रहा है। मेरे हसबैंड को अंदर बुला दीजिए और आप भी यहीं खड़ी रहिए। मुझे सफोकेशन-सा हो रहा है। “मैं एक साँस में बोले जा रही थी, और मशीन में जाने पर बंद हो जाने का डर मेरा दम घोंट रहा था।
“आपके हसबैंड बाहर नहीं हैं, और अगर होते भी तो उन्हें अंदर खड़ा नहीं करेंगे। और मैं भी बाहर रहूँगी। सिर्फ़ आप होंगी इस कमरे में। बाहर से ही देखा जाएगा और कंप्यूटर पर डिटेल्स आएगी,” बोलकर नर्स बाहर चली गई। जो एमआरआई करने वाले थे, वह भी मुझे सही पोज़िशन में लिटाकर जाने लगे।
तभी मैं बोल पड़ी — “मुझसे नहीं होगा यह सब। मुझे डर लग रहा है। मैं फिर कभी कराऊँगी, आज नहीं। प्लीज़ मेरे हसबैंड को बुलाइए।”
“चंदा जी, आपका ऑपरेशन थोड़े हो रहा है कि आपको बेहोश करेंगे। क्यों डर लग रहा है आपको? आपको तो बस सोना है, आँख बंद करके। थोड़ा तेज़ साउंड आएगा, बस। और हाँ, याद रखिए — ज़्यादा मूवमेंट न हो। यह कैनुला से जो दवाई दे रहे हैं, हम बार-बार नहीं दे सकते, इसलिए आज ही फाइनल करेंगे। आराम से सो जाइए, सब ठीक होगा,” बोलकर वह भी बाहर चले गए।
मैंने आँख बंद कर ली। गेट का बाहर से बंद होना और मशीन में मेरा स्ट्रेचर जाना मेरे क्लॉस्ट्रˈफ़ोबिया को बढ़ा रहा था। मैं मन ही मन एक से सौ तक गिनकर एक मिनट को काउंट करने लगी और पंद्रह मिनट का इंतज़ार करने लगी। पर प्रोसेस शुरू होते ही आने वाली आवाज़ें मुझे किसी भी तरह सहज रहने नहीं दे रही थीं।
आँख बंद किए मैं बस उस स्थिति में आ गई, जो बाहर बैठे वृद्ध लोगों की थी — जो होगा, ठीक होगा; जो हो रहा है, वह भी ठीक है। ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा? मैं मर जाऊँगी। और मेरे बाद मेरी बेटी और मेरे पति कैसे रहेंगे, यह वे लोग जाने — मैं तो मृत हो जाऊँगी, उनके दुखों का मुझे क्या?
इतनी स्वार्थी मैं अचानक कैसे हो गई — यह सोचते-सोचते मैंने खुद को निढाल छोड़ दिया। और जिस प्रकार लोग मृत्यु से पहले कुछ भजन या अच्छी यादें याद करना चाहते हैं, मैं भी आँख बंद कर वही करने लगी।
आँख बंद करते ही लगा जैसे मेरी बेटी मेरे पास खड़ी है और मुस्कुरा रही है — जैसे जब मैं उसके साथ लिफ्ट में चढ़ती हूँ, तो मेरे डरे चेहरे को देखकर वह ऐसे ही मुस्कुराती है। फिर लगा कि वह मेरे और पास आई और बोल रही है — “मम्मा, क्यों इतना डर रही हो? इतना तो हनु भी नहीं डरता, वह तो इतना छोटा है।”वह मेरे छोटे भाई सावन का बेटा था जो सिर्फ दो साल का था ।
जैसे ही उसने हनु का नाम लिया, उसका मासूम चेहरा आँखों के सामने आ गया। कुछ दिन पहले ही वह मेरे घर आया था और जैसे ही मैं उसे गोद में उठाने लगी, वह हँसते हुए मुझसे दूर भागने लगा — अपने दोनों कंधे कान से सटाए, आड़े-तिरछे दौड़ता हुआ। उसकी वह अदा याद कर मैं ज़ोर से हँस पड़ी।
तभी माइक से आवाज़ आई — “चंदा जी, हिलिए मत, इमेज सही नहीं आएगी।”
मैं फिर से शांत हो गई। इस बार भय ने मुझे अध्यात्म की तरफ़ मोड़ा। मुझे मनु भंडारी की वह बात याद आई —
“व्यक्ति में इतनी ताकत होनी चाहिए कि अपने दुख और संघर्षों से अकेले जूझ सके।”
इससे मन को बहुत सहारा मिला।
तभी दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई और नर्स ने कहा — “हो गई आपकी एमआरआई, उठ जाइए।”
मैं बाहर आई। नर्स ने कैनुला निकाल दिया। मैं फिर चिल्लाई — “उफ्फ!”
इस बार नर्स फिर मुस्कुराई, और उसके मुस्कुराने पर मैं भी मुस्कुरा दी। मैंने उसे थैंक्यू कहा।
नर्स ने पूछा — “ज़्यादा दर्द तो नहीं हुआ?”
मैंने ‘ना’ में सिर हिलाया।
जाते-जाते मैंने कहा — “यह हॉस्पिटल भी क्या चीज़ है — आप सुई लगाते हो, दर्द होता है, फिर भी हम आपको थैंक्यू कहते हैं।”
नर्स बाहर निकलते-निकलते मुड़ी और बोली —
“आप थैंक्यू दर्द के लिए नहीं, यहाँ से ठीक होकर जाने के लिए कहते हैं।”
उसकी आवाज़ में मुझे पॉज़िटिविटी दिखी।
जब मैं बाहर आई, तो हसबैंड वहीं बैठे थे। पता नहीं नर्स ने ऐसा क्यों कहा कि वह वहाँ नहीं हैं — शायद वह मुझे निडर बना रही थी। क्योंकि डर तभी तक हावी होता है, जब तक इंसान सोचता है कि कोई और उससे लड़ेगा। जैसे ही व्यक्ति खुद डर से लड़ता है, डर भाग जाता है।
बाहर आकर जब गाड़ी में बैठी, तब मुझे समझ आया कि जिस भगवान को मैं कोस रही थी, उसने मुझे कितनी प्यारी ज़िंदगी दी है, कितने प्यारे लम्हे दिए हैं — जिन्हें याद कर मैं किसी भी कठिन परिस्थिति में मुस्कुरा सकती हूँ।
“आज इस एक दिन ने मुझे पूरे जीवन का सार समझा दिया। लोग कहते हैं कि यदि जीवन को जानना है तो एक बार श्मशान जाना चाहिए—वहाँ जो ज्ञान मिलता है, वह कहीं और नहीं मिलता। लेकिन मैं कहती हूँ कि यदि आप एक बार अस्पताल जाएँ, तो शायद यह ज्ञान भी कुछ कम नहीं होगा। जीवन के प्रति आपकी मान्यता बदल जाएगी। इस दुनिया में जितनी खुशी हमें मिली है, उसे छोड़कर जो नहीं मिली, उसके पीछे भागते हैं। जो हमारे पास है, उसे तवज्जो नहीं देते। आज जितने लोग मुझे एमआरआई रूम में मिले, शायद वे मुझे फिर कभी न मिलें, पर उनके जीवन के प्रति आशावाद, उनकी हिम्मत और अपने लोगों के लिए उनके जज़्बात मुझे हमेशा याद रहेंगे ।
✍️चंदा
