“स्कूटी उड़ाती ये लड़कियां”
ये लड़कियां, ये लड़कियां, ऑफिस जाती ये लड़कियां।
भरी सड़क पर भीड़ में, स्कूटी उड़ाती ये लड़कियां।
सही समय पर ऑफिस जाऊं, सही समय से गृहस्थी निभाऊं।
सही समय निभाते–निभाते, खुद को भुलाती ये लड़कियां।
भरी सड़क की भीड़ में, खुद को रेल बनाती ये लड़कियां।
कभी अपना लंच बॉक्स भूलती, कभी अपना पर्स!
कभी ऑफिस के आई कार्ड को घर में भुलाती ये लड़कियां!
कभी भूलती बालों को बनाना, कभी भूलती मेकअप लगाना,
कभी मिसमैच दुपट्टे लेकर, स्लीपर में ऑफिस आती ये लड़कियां।
कभी सुबह की चाय भूलती, कभी ब्रेकफास्ट भी पर्स में रखती,
जल्दी पहुँचकर ऑफिस में ब्रेकफास्ट ले चाय पीती ये लड़कियां।
ये लड़कियां, ये लड़कियां,
ख़ुद को भुलाने वाली ये लड़कियां,
पर भूल से भी भूलती नहीं ये अपनी कोई ज़िम्मेदारियां।
ये ज़िंदगी की भागदौड़, ये वर्क-लाइफ बैलेंस का शोर,
ऑफिस के टारगेट, गृहस्थी का लोड,
फिर भी किसी काम को नहीं करती टालमटोल।
ये लड़कियां, ये लड़कियां,
अपने हेलमेट को दुपट्टे से एडजस्ट करती ये लड़कियां,
दोनों पांव से स्कूटी का बैलेंस बनाती ये लड़कियां।
ऑफिस की रिव्यू मीटिंग हो या स्कूल की पैरेंट मीटिंग,
घर के फंक्शन हों या ऑफिस के माइंड-ब्लोइंग टारगेट हों,
वर्क-लाइफ बैलेंस करती, स्कूटी रूपी जीवन को
आत्मविश्वास से उड़ाती ये लड़कियां।✍️ चंदा
