हर पल की स्वतंत्रता
स्वतंत्रता दिवस ,बचपन से ही मोहक रहा है। सुबह जल्दी उठना, स्कूल जाना, झंडा फहराना और जलेबी मिलना—ये किसी पर्व से कम नहीं था। धीरे-धीरे बड़े हुए तो समझ आया कि हम स्वतंत्र कैसे हुए, कितने बलिदानों और संघर्षों के बाद हमें यह आज़ादी मिली। बलिदान की इन कहानियों ने इस दिन को हमारे लिए एक त्योहार बना दिया।
इस उल्लास का निरंतर बने रहना सिर्फ स्कूल या पढ़ाई की वजह से नहीं , बल्कि इसकी असली वजह थी शिक्षक परिवार में मेरा जन्म लेना। मेरे दादा( राजेंद्र प्रसाद), बड़े पापा ( रविन्द्र कुमार रवि)और पापा ( नवीन कुमार सिन्हा),छोटे पापा( किशोर कुमार सिन्हा)—सभी, शिक्षण क्षेत्र से जुड़े थे। राष्ट्रीय पर्व के दिन घर में सुबह से ही धूम मची रहती थी—किसी को झंडा फहराना होता, किसी को भाषण तैयार करना होता, तो किसी को छात्रों में मिठाई बाँटनी होती।हर तरफ़ रौनक।
आज सुबह उठने के बाद मुझे फिर वही बचपन वाला उल्लास महसूस हुआ, क्योंकि शिक्षक परिवार की विरासत को मेरे भैया और दीदी ने पूरी तरह से कायम रखा है। मेरी दीदी, ग्रामीण विद्यालय, फतेहपुर में शिक्षिका हैं और भैया सिमुलतला आवासीय विद्यालय में शिक्षक। सुबह उठते ही दीदी( माला सिन्हा) का स्टेट्स देखा—सजी-धजी, नीली , रानी कलर की साड़ी में वह भारत माता लग रही थीं। उनके पीछे स्कूल की बच्चियाँ झंडे लेकर लाइन में खड़ी थीं। सबों के चेहरों पर स्वतंत्रता की खुशी झलक रही थी। भले ही वे आज के युग की बच्चियाँ हैं, लेकिन गाँवों में लड़कियों का आगे आकर स्कूल आना और उनके परिवारों में शिक्षा के प्रति जागरूकता—यही तो है असली स्वतंत्रता।
वहीं, बड़े भैया( डॉ प्रवीण कुमार सिन्हा)आवासीय विद्यालय में कार्यरत हैं। बच्चों के मानसिक, शैक्षणिक और शारीरिक विकास—सभी पहलुओं पर कार्य करते हुए वे अध्यापन कार्य कर रहे हैं। उनका भी फोटो वाट्सअप पर आया था—वैसे फोटो उनकी अर्धांगिनी ( अनीता भाभी) ने भेजा था, जो स्वयं भी प्रोफेसर हैं और हमारे परिवार की शिक्षण विरासत को चार चाँद लगाती हैं। भैया सफेद टीशर्ट और काली ट्राउज़र में स्कूल के प्रिंसिपल और पूरी टीम के साथ खड़े थे। ऐसा लग रहा था जैसे ,आज की सुबह देश की नई सुबह हो। वे सिर्फ स्कूल की टीम नहीं थे जो राष्ट्रगीत गा रहे थे, बल्कि वे प्रगति के पथिक थे जो राष्ट्र को नई दिशा प्रदान कर रहे थे।
एक और बात बताना चाहती हूँ—मेरी दीदी (जिनका ज़िक्र ऊपर किया गया है) के पति, प्रोफेसर, डॉ मुकेश सिन्हा और मेरे कज़िन भाई “कुंदन सिन्हा”भी शिक्षण क्षेत्र से जुड़े हैं। बहुत सौभाग्यशाली हूँ कि ऐसे परिवार में मैने जन्म लिया।
आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपनी बेटी को नए कपड़ों में झंडा लेकर सोसाइटी के सेलिब्रेशन में जाते देखना, अपने ससुर जी को बालकनी में झंडा लगाते देखना और सासू माँ को घर में काम करने वाली को जलेबी खाने के लिए पैसे देते देखना।भाई– बहन के बच्चों को तिरंगा के साथ ,उत्साहित देखना—ये सब दिल को सुकून दे रहा था।
देश को स्वतंत्रता दिलाने वाले और हमें इतना स्वतंत्र करने वाले कि हम यह जीवन अपने अनुसार जी सके, उन स्वतंत्रता सैनानियों, उन वीरों को सादर प्रणाम। उन शिक्षकों और उन प्रगति पथ के मार्गदर्शकों को सादर नमन जिन्होंने हमारी पीढ़ी को आगे बढ़ाने का काम किया है। हर पल स्वतंत्रता महसूस करवाने के लिए उन माता पिता को नमन जिन्होंने अपने बच्चों को स्वतंत्र रहना सिखाया।
✍️चंदा

Tumahre ye marmik sansmaran k sbad Dil ko chhu gaye …
Bahut achhs
👏👏👏👏 काबिलेतारीफ ..