तुम्हारा अस्तित्व
बचपन में तुम्हें गुड्डे-गुड़िया बहुत पसंद थे,
उसके घुँघराले बाल, उसकी गोल-गोल आँखें,
जिसे तुम सँवारती थी, उसे सजाती थी।
वह गुड़िया बिना किसी प्रतिकार के
तुम्हारे हर फ़ैसले को स्वीकारती थी।
फिर तुम बड़ी हुई, स्कूल जाने लगी।
बग़ल के मुहल्ले में कठपुतली का खेल देखना
तुम्हें बहुत प्रिय लगता था—
उसका नाचना-गाना,
किसी के इशारे पर, किसी की उँगली के सहारे।
उसे देख तुम मुस्कराती थी।
पढ़ी-लिखी तुम और बड़ी हुई,
फिर ब्याह हुआ—तुम पराया धन बनी।
सुख-समृद्धि, सोने-जवाहरात मिले,
गृहिणी, गृहलक्ष्मी
और न जाने कितने उपनाम मिले,
पर इस बार तुम खुश नहीं थी।
गुड़िया-सी ख़ामोश तुम्हारी आँखें,
कठपुतली की डोर से बँधा तुम्हारा अस्तित्व।
तुम प्रतिकार करना चाहती थी,
परंतु सहज नहीं था—संघर्षमय था
ख़ुद को सजीव साबित करना,
गुड़िया-कठपुतली के
सदियों से चले आ रहे खेल से
ख़ुद को अलग करना !✍️. चन्दा
