आख़िरी विदाई
चली जाना दूर… लेकिन कितना दूर,
एक बार बता कर चली जाती,
कोई सीमा बना लेती तुम,
दूरी की सीमा जहाँ अनंत न हो।
तो जाने देती तुम्हें,
क्योंकि जहाँ सीमा नहीं, वहाँ से लौटना सम्भव नहीं।
अगर दूरी का विस्तार न्यूनतम होता, तो
नहीं रोकती तुम्हें जाने से, कितना भी दूर।
नहीं करती तुम्हारा सोलह श्रृंगार,
नहीं पहनाती तुम्हें नई लाल गोटे की साड़ी,
नई पायल, नए झुमके,
नहीं ओढ़ाती तुम्हें बिहौती लाल चुनरी,
नहीं करती तुम्हारी विदाई दुल्हन बनाकर तुम्हें।
तुम्हें यहीं रोक लेती,
गर तुम्हारी अंतिम यात्रा की खबर होती कभी।
एक कमरे के एक बिस्तर पर,
एक गर्म चाय की प्याली के साथ,
रोक लेती तुम्हें गले लगाकर,
अपने हाथों से तुम्हारे बाल सँवारकर,
पुराना धुला हुआ सूट पहनाकर,
तुम्हारी पसंद का एक गीत गुनगुनाकर,
आँखों में काजल भी लगा देती,
तुम्हें बहुत दूर जाने नहीं देती।
जीवन की इस पूर्ण परिधि को स्वीकार कर,
चली गई तुम अपने अंतिम निवास पर,
छोड़ गई पीछे अपनी लंबी-सी मुस्कान,
ढेरों आशीर्वाद, कुछ प्यार भरे पल,
कुछ स्नेह-सिक्त स्वाद,
कुछ प्रेम के छींटे, जिनसे सराबोर है पूरा परिवार।
— मौलिक रचना : चंदा सिन्हा
