वह और प्रतीक्षा
वह खड़ी थी द्वार पर,
अपनी साँसें रोकी हुई।
साँस ही नहीं, अपनी जीवन की गति रोकी थी,
बिल्कुल बंद घड़ी की तरह।
शायद किसी के आने की प्रतीक्षा में,
शायद…
पथराई आँखें एकटक,
जहाँ आशा की लौ जली भी थी,
जिसे जबरदस्ती जला रखा था उसने,
जैसे हवा में बुझते दिए को कोई तीली लगा रहा हो।
वह जल रहा है और बुझ रहा है,
बार-बार…
वह खड़ी थी द्वार पर,
प्रतीक्षा को अपना लक्ष्य मानकर।
अक्सर स्त्री बुत बन जाती है,
काट लेती है सम्पूर्ण जीवन यूँ ही,
सही वक्त, सही व्यक्ति, सही अवसर की ताक में।
इंतज़ार में …
