क्यों रोती नहीं बेटियां
क्यों रोती नहीं बेटियां ,जब जाती हैं पढ़ने को,
अपने माँ-बाप से दूर,
दूर देश, दूर का आकाश, दूर का संसार,
कितने भी साल के लिए, अपने घर से दूर।
बस बिछोह और दिल भारी-सा होता है उनका,
पर रोती नहीं जार-जार वे,
चीखती भी नहीं अपने पिता के गले लगकर,
काँपती नहीं अपने बड़े भाई से लिपटकर।
क्योंकि ये बिदाई नहीं उसकी किसी पराए घर के लिए,
क्योंकि उसे बताया नहीं गया कि
माँ-बाप, भाई से बिछोह का दुख नहीं रुलाता उसे,
उसे रुलाता है पराया हो जाने का भाव,ब्याह वाली विदाई में
उसे रुलाता है समाज, जो खुद भी रोता है उसके साथ,
उसे बताता है बिरादरी कि तुम अब इस घर की नहीं रही,
और बताया जाता है ये आख़िरी रस्म है तेरा इस घर में
क्यों उससे शर्त रखी जाती है कि
नया जोड़ने के लिए पुराने को तोड़ना है जरूरी ?
क्यों उसे नहीं कहा जाता, लड़कों की तरह, कि
ब्याह के बाद भी वह वही रहेगी, अपने अस्तित्व को जीवित रखेगी,
कि वह एक बेटी भी है, न कि किसी की सिर्फ बहू?
क्या बेटों का स्थिर संसार, स्थिर अस्तित्व जीवन नहीं चलाता?
तो फिर क्यों बेटियों का संसार परिवर्तनीय माना जाता ?
जीवन चक्र के लिए कुछ रिश्ते जरूरी हैं जोड़ने,
लेकिन तोड़ना—किसी को अपने ही जड़ से अलग करना—
किसने ये सामाजिक नियम बनाया ?
ये प्रकृति कभी नहीं चाहती कि कोई रिश्ता टूटे,
वह तो बस ये चाहती है—जुड़ते रहें रिश्ते बिना कुछ टूटे हुए,
भले वह झरनों की निरंतरता हो,भले वह भूमि की कठोरता,
भले वह पहाड़ की एकाग्रता हो,भले वह बेटियों का संसार हो।
