23, Jul 2025
सोती हुई तुम।

मुझे अच्छा लगता है !
तुम्हारा यूं थक कर सो जाना ! क्यों कि देखता हूं रोज ,अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए, तुम्हें “थकते “हुए।

मुझे अच्छा लगता है!
जब, तुम ऊंघते नयनों को, बिना उनके स्वीकृति के, खोलने की कोशिश करती हो,
जैसे वह नयन नहीं !तुम्हारे अस्तित्व की सीमा हो, जिसे तुम बृहद करना चाहती हो!

मुझे अच्छा लगता है ,
सोते हुए तुम्हें चादर ऊढाना,
कमरे की रौशनी को मद्धम करना ताकि तुम सो सको अपने हिस्से की नींद !

मुझे अच्छा लगता है ,
सोते हुए तुम्हारा अक्स ,
प्रेम में लिपटी तुम्हारी आभा
जिसका प्रतिबिंब मुझे एहसास दिलाता है ,
तुम हो तो सब कुछ है ।
✍️चंदा

One thought on “सोती हुई तुम।

  1. बहुत बढ़िया चंदा…आपने कविता में शब्दों को बहुत खूबसूरती से लिखा है। यह मेरे दिल को छू गई।

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