तुम घर सम्भालो बस
कॉल बेल की आवाज़ से मैं उठ गई। वैसे तो सुबह के ८ बज रहे थे, लेकिन रात में ऑफिस से लेट आने की वजह से मैं देर तक सोई हुई थी और आज रविवार भी था, तो ऑफिस भी नहीं जाना था। मैं और मेरी नींद दोनों छुट्टी के मूड में थे।
कौन है भाई इतनी सुबह-सुबह? मैं बेड से बड़बड़ाते हुए उठते ही अपने खुले और कटे हुए छोटे बालों को रबर डालकर समेटने की कोशिश में लग गई थी।
अरे, तुम कैसी हो? दरवाज़ा खोलते ही सामने धोबन की बेटी को देखकर मेरा बिगड़ा मूड ठीक हो गया।
ठीक हूँ मैडम जी, वो पापा ने प्रेस के कपड़े लाने को कहा है, वह मुस्कुराते हुए बोली।
अरे हाँ, बहुत कपड़े रखे हैं। ऐसा करो, तुम अंदर आ जाओ। मैंने दरवाज़ा खोल दिया और उसे बालकनी की तरफ़ इशारा किया कि जाओ और कपड़े ले लो। उसे बोलकर मैं प्रेस के कपड़े ले जाने के लिए चादर ले आई।
धोबन की बेटी मिनी आठवीं क्लास में पढ़ती थी। कुछ दिन पहले उसकी माँ कपड़े लेने आई थी और बोल रही थी कि आजकल उसे पढ़ाई में दिल नहीं लगता। उसकी माँ की बात याद करके मैंने उससे पूछ लिया—और कैसी चल रही पढ़ाई-लिखाई? स्कूल जा रही हो आजकल या मम्मी-पापा का सिर्फ़ काम में हाथ बटाती हो?
अब तो हो गई मेरी पढ़ाई। मिनी ने हँसते हुए मेरी तरफ़ बिना देखे बोला और कपड़े गिन-गिन कर चादर के ऊपर रखने लगी।
क्यों, क्या हुआ? मैं उसकी हँसी को समझ नहीं पाई। मैं किचन से गर्म पानी का ग्लास लेकर सोफ़े पर आ बैठी। तभी मेरी कामवाली आ गई और मुझे चाय के लिए पूछने लगी।
लेकिन चाय को हाँ बोलने के बजाय मैं मिनी को देख रही थी। मेरे “क्या?” और प्रश्नवाचक चेहरे को देखकर वह फिर मुस्कराई और बोली—अब तो पढ़ाई हो गई मेरी, अब तो शादी हो रही है। मिनी का साँवला चेहरा ख़ुशी से दमक रहा था।
मैं स्तब्ध हो गई थी। मेरी बेटी भी आठवीं क्लास में थी और वह कितनी छोटी है अभी, और ये लड़की उसी की उम्र की होकर शादी कर रही—कैसे हैं इसके माँ-बाप? मैं अपने मन की उथल-पुथल बिना प्रदर्शित किए बोली—अरे, तेरी उम्र कहाँ हुई अभी? तू तो अभी आठवीं में है न, तेरह-चौदह साल की होगी अभी। ऐसे कैसे शादी?
हाँ मैडम, पर मैं तेरह-चौदह की नहीं, सत्रह साल की हूँ। मिनी भी अपनी हँसी के फ़व्वारे को रोकने की कोशिश में लगी हुई थी।
मुझे समझ नहीं आ रहा था—उस मासूम की शादी और शादी के बाद पूरा गृहस्थी, जैसा कि हमारे समाज में है कि बहू के आते ही पूरा घर मालिक हो जाता है और नई बहू सबकी नौकरानी हो जाती है, और वह भी २४ घंटे वाली।
मैं उस बच्ची को १०-१२ साल से जानती थी। अपनी माँ के साथ वह कपड़े लेने आती थी, इसलिए मेरा मन उसके जीवन में आने वाले इस आपात परिवर्तन के लिए डर रहा था।
“क्यों पढ़ाई क्यों ख़त्म? तुम शादी के बाद भी पढ़ना। अब तो हर कोई लड़कियों को पढ़ाना चाहता है। जमाना बदल रहा है बेटा !पापा को बोलो कि तुम्हारे ससुराल में बात करें। “मैं एक साँस में बोल गई।
नहीं, उनके यहाँ ये सब नहीं होता, कोई पढ़ाई-वढ़ाई नहीं, घर संभालो बस, लड़का कंपनी में जॉब करता है साफ़-सफ़ाई का और पापा तो ख़ुश है कि मेरी शादी हो रही है वह भी एक बार में मुझे पसंद कर लिया गया है , वह तो कोई ऐसी बात नहीं बोलेंगे जिस से शादी में कोई रुकावट आए।हम चार बहनें है न मैडम जी ,पापा भी मुझे ससुराल भेज अपनी जिम्मेदारी से निवृत्त होना चाहते हैं “मिनी अपने सौभाग्य पर ख़ुशी से पागल होते हुए बोली।
मैं पानी का ग्लास हाथ में लिए उसे जाते हुए देख रही थी। पढ़ाई छोड़ने और दुल्हन बनने की उसकी ख़ुशी उसकी चाल में भी नज़र आ रही थी। उसके मासूम दिल को कहाँ पता था—“घर संभालो बस” ये कितनी लड़कियों के खुशियों के दमन का प्रथम चरण है।
✍️चन्दा

Abhi ke samay mein sabse jwlant Mudda hai chhoti bacchiyon ka Vivah ,Bal Vivah .yah samasya hamare samaj mein ek Korh ki tarah abhi bhi vyapt hai iske liye yah kahani bahut hi acchi lagi thankyou Chanda