5, Apr 2026
तुम घर सम्भालो बस

कॉल बेल की आवाज़ से मैं उठ गई। वैसे तो सुबह के ८ बज रहे थे, लेकिन रात में ऑफिस से लेट आने की वजह से मैं देर तक सोई हुई थी और आज रविवार भी था, तो ऑफिस भी नहीं जाना था। मैं और मेरी नींद दोनों छुट्टी के…

5, Apr 2026
माँ घर आ रही …

माँ घर आ रही । अपने आँचल की कोर में बाँधे हुए रूढ़ प्रथाओं को,अपने हृदय में समेटे हुए मेरी बचपन की यादों को। माँ घर आ रही… उसे पता है कि वह सिर्फ़ माँ है, न कि समाज का दिया दर्जा,जहाँ से उसे इजाज़त लेनी पड़े बेटी के ससुराल…

21, Mar 2026
हॉस्पिटल का वह एक दिन

“मैं बहुत डर-सी गई थी। डॉक्टर ने प्रिस्क्रिप्शन में एमआरआई लिख दिया था। वैसे तो चालीस पार जा चुकी हूँ, पर कभी इस टेस्ट की नौबत नहीं आई। गुस्सा आ रहा था मुझे अपने पति पर — बस एक राग अलापते रहते हैं, फुल बॉडी चेकअप कराओ। उनकी ज़िद के…

8, Mar 2026
“स्कूटी उड़ाती ये लड़कियां”

ये लड़कियां, ये लड़कियां, ऑफिस जाती ये लड़कियां।भरी सड़क पर भीड़ में, स्कूटी उड़ाती ये लड़कियां। सही समय पर ऑफिस जाऊं, सही समय से गृहस्थी निभाऊं।सही समय निभाते–निभाते, खुद को भुलाती ये लड़कियां।भरी सड़क की भीड़ में, खुद को रेल बनाती ये लड़कियां। कभी अपना लंच बॉक्स भूलती, कभी अपना…

9, Feb 2026
तुम्हारा अस्तित्व

बचपन में तुम्हें गुड्डे-गुड़िया बहुत पसंद थे,उसके घुँघराले बाल, उसकी गोल-गोल आँखें,जिसे तुम सँवारती थी, उसे सजाती थी।वह गुड़िया बिना किसी प्रतिकार केतुम्हारे हर फ़ैसले को स्वीकारती थी। फिर तुम बड़ी हुई, स्कूल जाने लगी।बग़ल के मुहल्ले में कठपुतली का खेल देखनातुम्हें बहुत प्रिय लगता था—उसका नाचना-गाना,किसी के इशारे पर,…